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पंचक में शुरू हो रहा है श्राद्ध पक्ष, इन उपायों को करेंगे तो सभी कष्टों से मिलेगी मुक्ति

हिंदूधर्म में श्राद्ध पक्ष का काफी महत्व होता है, इस दौरान हर कोई अपने पितरों की पूजा करता है। वहीं पितृ पूजा के साथ ही साथ जीव संरक्षण भी होता है। 16 दिनों तक होने वाले श्राद्ध में पशु-पक्षियों को भी भोजन कराया जाता है। इसके अलावा पितरों को नदी, तालाब और जलाशयों में तर्पण देने की परंपरा प्रकृति संरक्षण से जुड़ी है। इस साल भाद्रपद की पूर्णिमा पितृ पक्ष 13 सितंबर से लेकर 28 सितंबर तक चलेगा। शुक्रवार से पंचक भी शुरू हो गए हैं।

शास्त्रों का कहना है कि श्राद्ध पक्ष में वसुगण, रूद्रगण और आदित्यगण का पूजन किया जाता है। पितृ पक्ष पितरों का याद करने का समय माना गया है। पितर 2 प्रकार के होते हैं एक दिव्य पितर और दूसरे पूर्वज पितर। दिव्य पितर ब्रह्मा के पुत्र मनु से उत्पन्न हुए ऋषि हैं। पितरों में सबसे प्रमुख अर्यमा हैं जिनके बारे में गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि पितरों में प्रधान अर्यमा वे स्वयं हैं।

ऎसे करें तर्पण

इस दिन व्रती को चाहिए कि सुबह जग कर स्नान करें उसके बाद कलश की स्थापना करें। कलश पर अष्टदल कमल के समान बने बर्तन में कुश से निर्मित अनंत की स्थापना की जाती है। इसके आगे कुंकूम, केसर या हल्दी से रंग कर बनाया हुआ कच्चे डोरे का चौदह गांठों वाला अनंत भी रखा जाता है। गणेश चतुर्थी के दिन गणेश जी कि स्थापना की जाती है तो वहीं अनंत चतुर्दशी गणेश जी अपने घर वापस लौट जाते हैं। ज्योतिषियों की मानें तो इन दिनों में नदी, तालाब, जलाशय या घर की देहरी पर तर्पण कर सकते हैं। पितरों को पानी देने वाला अनामिका अंगुली में कुशा पहने। इतना ही नहीं इसके अलावा दक्षिणमुखी होकर अंजली में जल भरकर 5 या 11 बार तर्पण करें। प्रतिदिन गीता का पाठ करें। तर्पण क्रिया के बाद ही भोजन ग्रहण करें।

इन दानों का होता है खास महत्व

पितृ पक्ष में गाय, भूमि, तिल, सोना, घी, गुड़, वस्त्र, धान, चांदी और नमक के दान का खास महत्व होता है। कहा तो यह भी जाता है कि तुलसी की गंध से पितृगण प्रसन्न होते हैं, इतना ही नहीं पानी देने वाले को ब्रह्मचर्य, जीमन पर सोना व वाणी पर संयम रखने के नियम का पालन करना होता है। दूध से बने पदार्थ का भोजन बनाएं।

पिंडदान से भी जीवों को मिलता है आहार

ज्योतिष शास्त्र की मानें तो श्राद्ध पक्ष धार्मिक व जीव संरक्षण दोनों के लिए खास है। इतना ही नहीं पूर्वजों का श्राद्ध कर जीवों को भोजन खिलाया जाता है, इसके साथ ही साथ पिंड दान से नदी व तालाबों में मछलियों को भोजन मिलता है। इतना ही नहीं पिंड आटा या चावल के बने होते हैं। पूजा के बाद इनका विसर्जन जल स्त्रोत में किया जाता है। साथ ही नदी, तालाब, कुंओं पर तर्पण करने की परंपरा से प्राकृतिक जलस्त्रोत का संरक्षण होता है।

बन रहे हैं कई शुभ योग

इस बार एक ऐसा योग भी आ रहा है, जो 22 सितंबर 1991 के बाद 24 वर्षों पश्चात आ रहा है जिसमें सिंह का बृहस्पति तथा कन्या का सूर्य है, जो बहुत ही महत्वपूर्ण है। चान्द्र मास की गणना के अनुसार इस बार गणेश स्थापना 10 दिन न रहकर 11 दिन रहेगी।

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