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बारहवीं बोर्ड में आए थें मात्र 39% नंबर, आज इतनी बड़ी कंपनी के हैं मालिक

वो कहते हैं कि जिस व्यक्ति के अंदर कुछ कर गुजरने का जूनून हो व मेहनत करने की क्षमता हो तो वो कुछ भी कर गुजरता है। जी हां हाल ही में एक ऐसी ही कहानी सामने आई है जिसे सुनने के बाद कई हताश लोग एक बार फिर से अपने सपने को सकारने में लग जाएंगे। दरअसल हम बात कर रहे हैं राजस्थान के राजीव दांतोड़िया की ये एक ऐसे छात्र हैं उन छात्रों के लिए प्रेरणा हैं, जो कम नंबर आने पर हताश हो जाते हैं। जी हां राजीव की उम्र 41 साल की है जो कि 12 वीं कक्षा में सिर्फ 39 प्रतिशत अंक आए थे।

हैरानी की बात तो यह है कि वो इतना कुछ होने के बावजूद सामान्य बच्चों की तरह डिप्रेशन में नहीं गए, बल्कि घर पर जमकर पढ़ाई की और IIT-JEE का एग्जान क्रैक कर लिया। आपको बता दें कि इस एग्जाम के बाद उन्होने स्वीडन में Tetra Pak नाम की कंपनी में सीनियर एनालिटिक्स रिलायबिलिटी इंजीनियर के तौर पर काम कर रहे हैं इसलिए ‘कामयाबी के पीछे मत भागो, काबिल बनो, कामयाबी तुम्हारे पीछे झक मार कर आएगी।’

राजस्थान में जन्मे राजीव की कहानी ‘द बेटर इंडिया’ में छपी हुई है, जिसमें बताया गया है कि वो एक मध्यम परिवार से ताल्लुक रखते थें और उनकी पढ़ाई सामोद और धौलपुर में हुई। राजीव कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह इस मुकाम तक पहुंचेंगे, इनका बचपन उस दौर से गुजरा है जब वो हर साल वार्षिक परीक्षा का इंतजार करते थें वो भी इसलिए क्योंकि किताबें बेचकर उनसे मिलने वालों पैसे से हम क्रिकेट बॉल्स खरीद सकें। यह बताता है कि हम पढ़ाई को लेकर कितना गंभीर थे।

राजीव अपने 12 वीं की परीक्षा के बारे में बात करते हैं जिसमें वो कहते हें कि ‘कैमेस्ट्री में कुछ ग्रेस नंबर मिल गए, जिसके चलते मैं 12वीं (1995) पास कर सका। फिर आगे की पढ़ाई के लिए विकल्प तलाशने लगा। अंक कम होने के कारण वह ग्रेजुएशन के लिए अप्लाई नहीं कर सके। इतना ही नहीं इस दौरान उनका भाई IIT परीक्षा के लिए फॉर्म भर रहा था। राजीव ने भी एग्जाम देने का फैसला किया। वहीं यह भी बता दें कि हिंदी मीडियम स्कूल से पढ़ने के कारण उनकी अंग्रेजी कमजोर थी। ऐसे में यह फैसला उनके लिए तैरने नहीं आने के बावजूद भी स्विमिंग पूल की गहराई में उतरने जैसा था।

उन्होने यह भी बताया कि इसके बाद से उन्होने अपनी तैयारी के लिए एक कोचिंग को चुना लेकिन इस दौरान भी अफसोस की उन्हें कोचिंग सेंटर ने कहा कि ने कुछ किताबें खरीदीं जिनमें हिंदी टू इंग्लिश वाली डिक्शनरी भी शामिल थी। यह किताबें उन्हें एक स्थानीय बुक सेलर ने सजेस्ट की थीं। जब राजीव ने घर पर पढ़ाई शुरू की तो उन्हें मजा आने लगा और उनका मनोबल बढ़ने लगा।

बताते चलें कि साल 2000 में उन्होंने IIT क्रैक किया और IIT-खड़गपुर से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट में 5 साल की डुअल डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने स्वीडन की Lulea यूनिवर्सिटी से पीएचडी करने का फैसला किया और अब जाकर इस मुकाम को पाया। ये वाकई में एक मिसाल भरी कहानी है।

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